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    Home»टेक्नोलॉजी»Perplexity CEO Aravind Srinivas की चेतावनी: क्या अरबों के ‘Data Centers’ अब कूड़ा बन जाएंगे?
    टेक्नोलॉजी

    Perplexity CEO Aravind Srinivas की चेतावनी: क्या अरबों के ‘Data Centers’ अब कूड़ा बन जाएंगे?

    Ankit VishwakarmaBy Ankit Vishwakarma06/01/2026No Comments5 Mins Read
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    ChatGPT Image Jan 6 2026 08 25 41 AMnexonews
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    AI की दुनिया में इस समय एक ‘हथियारों की होड़’ (arms race) मची हुई है। Google, Microsoft और Meta जैसी दिग्गज कंपनियाँ अरबों-खरबों डॉलर खर्च करके बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स बना रही हैं। लेकिन इसी बीच Perplexity के CEO Aravind Srinivas ने एक ऐसी बात कह दी है जिसने पूरी टेक इंडस्ट्री को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

    अरविंद श्रीनिवास का कहना है कि जिस ‘सेंट्रलाइज्ड’ इंफ्रास्ट्रक्चर पर आज पूरी दुनिया पैसा लगा रही है, वह जल्द ही Obsolete (बेकार) हो सकता है।

    इस खबर में क्या है खास?

    • डेटा सेंटर्स के लिए सबसे बड़ा ‘खतरा’ क्या है?
    • On-device AI का जादू कैसे काम करेगा?
    • क्या टेक दिग्गजों का पैसा डूबने वाला है?

    Table of Contents

    • डेटा सेंटर्स के लिए सबसे बड़ा ‘Existential Threat’ (Background)
    • On-device AI: आपके हाथ में होगा ‘Digital Brain’ (Core Details)
    • क्या Trillions का निवेश खतरे में है? (Analysis)
    • यह खबर किसके लिए ज़रूरी है?
    • रिस्क और लिमिटेशन्स: क्या अरविंद की बात 100% सही है?
    • निष्कर्ष: क्या हम एक नए युग की शुरुआत में हैं?
    • FAQs:
      • क्या डेटा सेंटर्स सच में बंद हो जाएंगे?
      • अरविंद श्रीनिवास ने ‘डिजिटल ब्रेन’ किसे कहा है?
      • क्या मेरा फोन अभी AI चलाने के काबिल है?
      • इस बदलाव से पर्यावरण को क्या फायदा होगा?
      • Disclaimer

    डेटा सेंटर्स के लिए सबसे बड़ा ‘Existential Threat’ (Background)

    हाल ही में एक पॉडकास्ट (Prakhar Gupta के साथ) में अरविंद श्रीनिवास ने कहा कि अगर AI की इंटेलिजेंस को सीधे आपके स्मार्टफोन या लैपटॉप के Chip में पैक कर दिया जाए, तो फिर दूर बैठे किसी डेटा सेंटर की क्या ज़रूरत?

    अभी क्या होता है? आप ChatGPT या Perplexity से कुछ पूछते हैं, आपका डेटा इंटरनेट के जरिए दूर किसी सर्वर पर जाता है, वहाँ प्रोसेसिंग होती है और फिर जवाब वापस आता है। इसमें बिजली भी बहुत खर्च होती है और समय (latency) भी लगता है।

    अरविंद के मुताबिक, “On-device AI” ही डेटा सेंटर्स की बर्बादी का कारण बनेगा।

    On-device AI: आपके हाथ में होगा ‘Digital Brain’ (Core Details)

    सोचिए अगर आपका फोन ही इतना स्मार्ट हो जाए कि उसे इंटरनेट की ज़रूरत ही न पड़े। अरविंद श्रीनिवास ने इसके 3 बड़े फायदे बताए हैं:

    1. Instant Processing: सर्वर पर डेटा भेजने का इंतज़ार नहीं करना होगा। सब कुछ पलक झपकते ही आपके फोन पर होगा।
    2. Privacy (गोपनीयता): आपका पर्सनल डेटा आपके डिवाइस से बाहर कभी जाएगा ही नहीं। यह सुरक्षा के लिहाज़ से एक बहुत बड़ी जीत होगी।
    3. Personalized Intelligence: अरविंद इसे “Digital Brain” कहते हैं। यह AI आपके काम करने के तरीके को देखेगा, आपकी आदतों को समझेगा और बिना क्लाउड की मदद के खुद को आपके हिसाब से ढाल लेगा। इसे तकनीकी भाषा में ‘Test Time Training’ भी कहा जाता है।

    क्या Trillions का निवेश खतरे में है? (Analysis)

    मार्केट रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2030 तक डेटा सेंटर्स पर निवेश $1 ट्रिलियन (करीब 84 लाख करोड़ रुपये) तक पहुँच सकता है। अरविंद श्रीनिवास का सवाल सिंपल है—”अगर इंटेलिजेंस डिवाइस पर आ गई, तो इस भारी भरकम खर्च का क्या मतलब रह जाएगा?”

    चुनौतियां और सच्चाई (Pros & Cons):

    • Pros: ऑन-डिवाइस AI बिजली बचाएगा, पानी की खपत (cooling के लिए) कम करेगा और यूज़र को कंट्रोल देगा।
    • Cons: अभी तक कोई भी कंपनी ऐसा मॉडल नहीं बना पाई है जो पूरी तरह से बिना क्लाउड के जटिल टास्क (complex tasks) कर सके। Apple और Qualcomm इस दिशा में काम तो कर रहे हैं, लेकिन मंज़िल अभी दूर है।

    यह खबर किसके लिए ज़रूरी है?

    • Tech Investors: अगर आप क्लाउड या डेटा सेंटर स्टॉक्स में निवेश करते हैं, तो आपको इस ‘डिसरप्शन’ पर नज़र रखनी चाहिए।
    • Developers: भविष्य ‘Edge AI’ और ‘On-device models’ का हो सकता है।
    • Smartphone Users: आने वाले समय में आपके फोन की कीमत उसके ‘AI Chip’ की ताकत पर तय होगी।

    रिस्क और लिमिटेशन्स: क्या अरविंद की बात 100% सही है?

    यहाँ कुछ बातें ध्यान देने वाली हैं:

    • Training vs Inference: डेटा सेंटर्स शायद ‘Inference’ (जवाब देने) के लिए कम ज़रूरी हो जाएं, लेकिन बड़े मॉडल्स को ‘Train’ करने के लिए हमेशा भारी मशीनों की ज़रूरत पड़ेगी।
    • Hardware Constraints: फोन की बैटरी और हीट की समस्या ऑन-डिवाइस AI के लिए एक बड़ी रुकावट है।
    • Hybrid Model: ज़्यादातर एक्सपर्ट्स का मानना है कि भविष्य ‘Hybrid’ होगा—छोटे काम फोन पर और भारी काम क्लाउड पर।

    निष्कर्ष: क्या हम एक नए युग की शुरुआत में हैं?

    अरविंद श्रीनिवास की यह चेतावनी किसी डरावने सपने जैसी लग सकती है, लेकिन यह असल में ‘Decentralization of Intelligence’ की ओर एक इशारा है। अगर टेक कंपनियाँ सिर्फ डेटा सेंटर्स बनाने में लगी रहीं और डिवाइस लेवल की इनोवेशन को भूल गईं, तो वे वाकई पीछे छूट सकती हैं।

    Next Steps:

    • देखें कि आगामी CES 2026 में चिप बनाने वाली कंपनियाँ (जैसे Intel, NVIDIA, Apple) क्या नया पेश करती हैं।
    • अपने डेटा की प्राइवेसी को लेकर जागरूक रहें और ऑन-डिवाइस AI फीचर्स का इस्तेमाल शुरू करें।
    • टेक इंडस्ट्री के इस बदलाव को समझने के लिए बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स की ‘Sustainability’ रिपोर्ट्स पढ़ें।

    FAQs:

    क्या डेटा सेंटर्स सच में बंद हो जाएंगे?

    पूरी तरह से बंद नहीं होंगे, लेकिन उनका इस्तेमाल कम हो सकता है। वे मुख्य रूप से बड़े मॉडल्स की ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे।

    अरविंद श्रीनिवास ने ‘डिजिटल ब्रेन’ किसे कहा है?

    उन्होंने आपके डिवाइस (फोन/लैपटॉप) पर चलने वाले उस AI को डिजिटल ब्रेन कहा है जो आपकी आदतों को सीखता है और डेटा लीक नहीं होने देता।

    क्या मेरा फोन अभी AI चलाने के काबिल है?

    अभी के मॉडल्स काफी भारी हैं, लेकिन लेटेस्ट प्रोसेसर वाले फोंस में ‘NPU’ (Neural Processing Unit) होता है जो छोटे AI टास्क आसानी से कर लेता है।

    इस बदलाव से पर्यावरण को क्या फायदा होगा?

    डेटा सेंटर्स भारी मात्रा में बिजली और पानी का इस्तेमाल करते हैं। ऑन-डिवाइस AI इस पर्यावरणीय बोझ को काफी हद तक कम कर सकता है।

    Disclaimer

    यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। तकनीकी भविष्यवाणियां बदल सकती हैं और यह किसी भी प्रकार की निवेश सलाह नहीं है। पाठक कृपया अपनी रिसर्च स्वयं करें।

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    Ankit Vishwakarma
    • Website

    अंकित विश्वकर्मा एक सॉफ्टवेयर डेवलपर, ग्रोथ मार्केटर और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकार हैं। वे टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप्स, बिज़नेस इनोवेशन और डिजिटल इकॉनमी पर डेटा-ड्रिवन विश्लेषणात्मक रिपोर्ट लिखते हैं। विभिन्न इंडस्ट्रीज़ में ऑटोमेशन, लीड जनरेशन और परफॉर्मेंस मार्केटिंग पर काम करने का उनका व्यावहारिक अनुभव उनकी रिपोर्टिंग को भरोसेमंद और गहराई से जुड़ा बनाता है।

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