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हापुड़। हाल ही में हापुड़ में अंडों के एक बड़े काले कारोबार का भंडाफोड़ हुआ, जहाँ सफेद अंडों को रंगकर ‘देसी’ के नाम पर बेचा जा रहा था। लेकिन अगर हम इस घटना को सिर्फ एक पुलिसिया कार्रवाई के नजरिए से न देखकर इसके पीछे के तंत्र को समझें, तो यह मामला आधुनिक खाद्य बाजार की एक गहरी और डरावनी सच्चाई को उजागर करता है।
‘ऑर्गेनिक’ के प्रति भरोसे का कत्ल
बाजार में आजकल ‘देसी’ और ‘प्राकृतिक’ उत्पादों की भारी मांग है। लोग अच्छी सेहत के लिए सामान्य से दोगुनी कीमत देने को तैयार रहते हैं। जालसाजों ने इसी मनोवैज्ञानिक स्थिति का फायदा उठाया। सफेद अंडों को चाय की पत्ती के पानी या हानिकारक केमिकल से रंगकर भूरा करना केवल आर्थिक ठगी नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे का कत्ल है जो एक उपभोक्ता अपने स्वास्थ्य के लिए करता है।
केमिकल का खतरनाक खेल: लाल जर्दी का सच
इस मामले का सबसे डरावना पहलू अंडों की ‘लाल जर्दी’ है। विशेषज्ञों के अनुसार, मुर्गियों को प्रतिबंधित एंटीबायोटिक्स (जैसे नाइट्रोफ्यूरान) या खास तरह के सिंथेटिक कलर वाले फीड दिए जाते हैं ताकि अंडे की जर्दी का रंग गहरा लाल हो जाए, जिसे ग्राहक ‘असली देसी’ समझकर खरीद लेते हैं।
चिंता का विषय: ये रसायन इंसानी शरीर में जाकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। यह मामला महज मिलावट का नहीं, बल्कि ‘धीमे जहर’ की सप्लाई का है।
रेगुलेटरी सिस्टम की खामियां
हापुड़ की इस घटना ने खाद्य सुरक्षा विभाग (FSDA) के निगरानी तंत्र पर भी सवाल खड़े किए हैं।
- पहचान का संकट: बाजार में असली और नकली देसी अंडे के बीच पहचान करने का कोई मानक पैमाना आम जनता के पास नहीं है।
- मिडलमैन का नेटवर्क: पोल्ट्री फार्म से लेकर आपकी थाली तक पहुँचने के बीच में जो ‘पैकेजिंग’ और ‘री-ब्रांडिंग’ के अवैध केंद्र चल रहे हैं, उन पर लगाम कसने में प्रशासन अक्सर नाकाम रहता है।
असली किसानों को नुकसान
इस तरह के घोटालों का सबसे बुरा असर उन छोटे और ईमानदार किसानों पर पड़ता है जो वास्तव में मुर्गियों को प्राकृतिक तरीके से पालते हैं। जब नकली देसी अंडों की खबरें आती हैं, तो ग्राहक का पूरे ‘ऑर्गेनिक मार्केट’ से भरोसा उठ जाता है, जिससे स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचती है।
जागरूक उपभोक्ता ही बचाव है
हापुड़ का यह कांड एक चेतावनी है कि ‘महंगा है तो अच्छा होगा’ वाली सोच अब खतरनाक साबित हो सकती है। जब तक सरकार ‘सीड-टू-शेल्फ’ (उत्पादन से लेकर बिक्री तक) की सख्त ट्रेसबिलिटी लागू नहीं करती, तब तक सेहत के नाम पर यह ‘रंगों का खेल’ चलता रहेगा।
नकली या रंगे हुए अंडों की पहचान करना थोड़ा मुश्किल जरूर है क्योंकि जालसाज बहुत सफाई से काम करते हैं, लेकिन इन 5 तरीकों से आप काफी हद तक इनके झांसे में आने से बच सकते हैं:
1. गर्म पानी और रगड़ का टेस्ट (Scratch Test)
अगर आपको संदेह है कि सफेद अंडे को भूरा (देसी) रंगा गया है, तो उसे हल्के गर्म पानी में डालें और अपनी उंगलियों या रुई से धीरे-धीरे रगड़ें।
- नकली: यदि अंडा रंगा हुआ होगा, तो उसका रंग उतरने लगेगा या रुई पर रंग के निशान आ जाएंगे।
- असली: असली देसी अंडे का रंग प्राकृतिक होता है, वह रगड़ने या धोने से सफेद नहीं होता।
2. छिलके की चमक (Texture Check)
- नकली: रंगे हुए अंडों पर अक्सर रंग की परत की वजह से एक अजीब सी चमक दिखाई देती है। छूने पर कहीं-कहीं सतह खुरदरी महसूस हो सकती है जहाँ रंग की बूंदें जम गई हों।
- असली: प्राकृतिक देसी अंडे की सतह थोड़ी ‘मैट’ (बिना चमक वाली) और एक समान होती है।
3. जर्दी (Yolk) का रंग और गंध
हापुड़ मामले में जर्दी को लाल करने के लिए रसायनों का इस्तेमाल किया गया था।
- नकली: अगर जर्दी का रंग अप्राकृतिक गहरा लाल या चमकीला नारंगी है, तो सावधान हो जाएं। साथ ही, केमिकल के कारण अंडे से एक अजीब सी तीखी गंध आ सकती है।
- असली: प्राकृतिक देसी अंडे की जर्दी आमतौर पर मध्यम पीली या हल्की नारंगी होती है, लाल नहीं।
4. कीमत का गणित
- अगर कोई आपको बहुत कम कीमत पर “प्योर देसी अंडे” दे रहा है, तो समझ लीजिए कि कुछ गड़बड़ है। असली देसी अंडे का उत्पादन कम और लागत ज्यादा होती है, इसलिए वे सफेद अंडों के मुकाबले काफी महंगे होते हैं।
5. अंडे का आकार और एकरूपता
- असली: असली देसी मुर्गियां अलग-अलग आकार के अंडे देती हैं (कोई छोटा, कोई थोड़ा बड़ा)।
- नकली: अगर दुकान पर रखे सभी देसी अंडे बिल्कुल एक ही आकार, एक ही वजन और एक ही रंग के दिख रहे हैं, तो संभावना है कि वे एक ही बैच में रंगे गए फॉर्म के सफेद अंडे हैं।
प्रो टिप: हमेशा भरोसेमंद डेयरी या सीधे पोल्ट्री फार्म से ही देसी अंडे खरीदने की कोशिश करें। पैकेट वाले अंडों पर FSSAI का लोगो और लाइसेंस नंबर जरूर चेक करें।
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